मंगलवार, 14 जुलाई 2009

बाल श्रम एक सामाजिक समस्या

आज हमारा देश विभिन्न सामाजिक समस्याओं से जूझ रहा है जिसमें बाल श्रम एक प्रमुख एवं संवेदनशील समस्या है। वर्तमान में बाल श्रम की समस्या देश के विकास में रोड़ा बन रही है। भारतीय संविधान में हमेशा से ही बाल श्रम समाप्त करने तथा बच्चों के सम्पूर्ण विकास के लिये आवश्यक उपाय किए जाते रहे हैं लेकिन वे सब अपर्याप्त ही रहे। आज बाल श्रम कानून को बने हुए 23 साल हो जाने के बावजूद हमारे देश में सर्वाधिक बाल मजदूर हैं। भारतीय सरकार के अनुसार देश में लगभग 12 लाख 60 हजार बाल मजदूर हैं। परंतु एक निजी संस्था के सर्वेक्षण के अनुसार अकेली दिल्ली में ही 70 लाख के करीब बाल मजदूर हैं।
एक अनुमान के अनुसार देश में प्रतिवर्ष 420000 बच्चे आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात रायों में बाल श्रमिक के तौर पर कार्य करने के लिये मजबूर होते हैं। देश में सबसे दयनीय स्थिति तो बालिका मजदूरों की है क्योंकि लड़कियों को कर्मचारियों के रूप में न देखकर केवल सहायक के रूप में देखा जाता है जिसके कारण बाल श्रम कानून भी इनकी रक्षा नहीं कर पाता। बाल श्रम का सबसे वीभत्स रूप वैश्यावृति और बंधुआ मजदूरी है। आईएलओ के अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 350000 बाल वैश्याएं हैं।
बाल श्रम का मूल कारण गरीबी है। गरीबी के अलावा प्रभावी शिक्षा व्यवस्था का अभाव, मां बाप की संकीर्ण मानसिकता एवं जागरूकता की कमी भी बाल श्रम को बढ़ावा देते हैं। मां बाप अपने बच्चे को औपचारिक शिक्षा दिलाने के बजाए कम उम्र में कार्य कौशल सिखाना यादा लाभप्रद समझते हैं। जिससे वो अपने परिवार की मदद कर सके। देश में सामाजिक कल्याण व्यवस्था का अभाव और आय के वैकल्पिक स्त्रोतों की कमी के कारण भी मां बाप अपने बच्चे से मजदूरी करवाने के लिये मजबूर हैं।
वर्तमान में सरकार और विभिन्न गैर सरकारी संस्थाएं बाल श्रम को समाप्त करने का प्रयास कर रही हैं। परंतु जहन में एक सवाल यह उठता है कि यदि बाल श्रम पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया जाए तो इन गरीब बच्चों के परिवारों का क्या होगा, क्या बच्चों की अतिरिक्त आय के बिना इनके परिवार जीवित रह पायेंगे? आईएलओ ने एक अध्ययन में पाया के परिवार की कुल आमदनी में बच्चों की आमदनी का हिस्सा 34 से 37 प्रतिशत के मध्य होता है। आईएलओ सांख्यिकी ब्यूरो के मुताबिक बच्चे का मजदूरी अथवा घरेलू उद्यमों के रूप में काम करना परिवार का आर्थिक स्तर को बनाए रखने के लिये आवश्यक है।
अत: सरकार को बाल श्रम समाप्त करने से पहले गरीबों की जरुरतों को पूरा करना पड़ेगा क्योंकि कोई भी सरकार बिना गरीबी को समाप्त करे बाल श्रम को पूर्ण रूप से समाप्त नहीं कर सकती।

रविवार, 12 जुलाई 2009

Success Has Hundred Husbands

Actually this post was to be published on July 7, 09 but I couldn’t.

‘ Today, my PET’s result has declared. It was very far from my expectations. Result was good but not my best. Actually everytime everything cann’t be perfect. I knew my bad time has started. I was overburdned by expectations of my relatives and well-wishers except my parents. My parents never pressurize me for anything. They know my ability of doing work. I was preparing myself for bearing ‘emotional-atayachar’. Your well-wishers are just like Indian Media. When you win match they appreciate you, give respect and make you feel that you are the king of this world but when you lose, you lose everything. Everybody forgets your previous achievements. My father aksar (usually) says that success has hundred husbands but failure has none. He has changed the original one. I am totally agry with these lines. When I got good marks in Class X, everyone was standing behind me . Everyone was appreciating me. I was at the top of the world. But….As I slipped little from my bench mark, no one was there even for consolation. Today I am alone. I have no freinds, no relatives and no well-wishers. This one result has changed everything. But this result can never change my parents. They are my real freinds, my real supporters and real well-wishers. They are everything for me.And I am not going to be depress because I have self confidence that one day success will again return.’

Note: I am very innocent with English. So please forgive my mistakes.

http://www.blogcatalog.com/directory/academics

रविवार, 5 जुलाई 2009

राष्ट्र की शिक्षा चिंता का विषय


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किसी भी राष्ट्र की सामाजिक एवं सांस्कृतिक उन्नति वहां की शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करती है। एक विकसित राष्ट्र जितना ध्यान अपने यहां कारखाने खोलने, बांध और सड़कें बनाने पर देता है उससे कहीं अधिक ध्यान वह अपने नागरिक ों को शिक्षित करने पर देता है। अत: साक्षरता व्यक्ति और देश की उन्नति की महत्तवपूर्ण शर्त है। अच्छी शिक्षा से ज्ञान की वृध्दि होती है, नम्रता आती है, भले बुरे का भेद जानने की क्षमता विकसित होती है और इससे वह समाज का योग्य व्यक्ति बन जाता है। इसलिए विद्या को मनुष्य का स्थायी आभूषण कहा गया है। भारत का प्राचीन इतिहास ज्ञान एवं शिक्षा के विकास की दृष्टि से बहुत अग्रणी रहा है किन्तु पिछले 200 वर्षों में ज्ञान और शिक्षा की दृष्टियों से निरन्तर गिरावट आई है। यदि हम 2001 की जनगणना के आंकडाें पर नजर डालें तो हमारे देश में 64.84 प्रतिशत व्यक्ति ही साक्षर हैं और 30 करोड़ व्यक्ति अभी भी हमारे देश में ऐसे हैं जो शिक्षा से वंचित हैं। भले ही आज विद्यालयाें एवं महाविद्यालयाें की संख्या पहले से अधिक है परन्तु उनमें पढाई के साधनाें की कमी है। सबसे बुरी हालत तो प्राथमिक शालाआें की है, क्याेंकि वो मूलभूत सुविधाआें एवं प्रशिक्षित अध्यापकाें के लिए तरस रहे हैं। पिछले दिनाें हुए एक सर्वेक्षण पर नार डालें तो भारत में एक लाख विद्यालय ऐसे हैं जो सिर्फ एक कमरे में ही चल रहे हैं तथा अन्य 75000 विद्यालय ऐसे हैं जिन्हें एक कमरा तक नसीब नहीं है । देश के 15 प्रतिशत स्कूलाें में एक से अधिक शिक्षक नहीं है। देश में अनुपस्थित रहने वाले शिक्षकों की संख्या 15 से 42 प्रतिशत के बीच है। पिछले सालाें में हुए आकस्मिक निरीक्षणाें के दौरान आधे से भी कम शिक्षक पढाते मिले। निश्चित तौर पर यह सरकार के लिए चिंता की बात है क्योंकि इन्हीं कारणाें की वजह से अन्तराष्ट्रीय स्तर पर चीन और थाईलैंड जैसे विकासशील देशाें से शिक्षा के क्षेत्र में हम अभी भी पीछे हैं। आज हमारे देश में बालक बालिकाआें को जो शिक्षा दी जाती है, उसमें रटने की परम्परा को अधिक बढावा मिल रहा है, इससे विद्यार्थियाें का उचित विकास नहीं हो पा रहा है। उनमें रोजगार-प्रधान शिक्षा का अभाव है। एक अनुमान के अनुसार देश में हर 5 में से केवल 1 व्यक्ति ने व्यावसायिक प्रशिक्षण लिया हुआ होता है जबकि चीन एवं थाईलैंड जैसे अन्य विकासशील देशाें में यह दर 5 मेें से 4 की है। इसी कारण से हमारे देश के नवयुवकाें को पढ़ाई पूरी करने के बाद भी राोगार के लिए भटकना पड़ता है। वर्तमान समय में सरकार द्वारा शिक्षा को सभी स्तराें पर प्रोत्साहित करने के लिए सर्व शिक्षा अभियान, मिड डे मील, डी पी ई पी जैसी अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं। इन योजनाआें का मुख्य उद्देश्य देश में लगभग 1.1 मिलियन बच्चाें को अच्छी शिक्षा प्रदान कराना तथा विद्यालयाें में मूलभूत सुविधाआें के अभाव को दूर करना है, परन्तु हमारे देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण यह योजनाएं आशा के अनुरूप परिणाम नहीं दे पाईं। हमारी विश्वविद्यालय प्रणाली, कई भागाें में जीर्णता की स्थिति में है। देश में लगभग आधे जिलाें में उच्च शिक्षा की स्थिति दयनीय है। हमारे देश के लगभग दो तिहाई विश्वविद्यालय और 90 प्रतिशत कॉलेज गुणवत्ता के मानकाें पर खरे नहीं उतरते। कई रायाें में विश्वविद्यालय के उपाध्यक्ष, वाईस चांसलर्स जैसे महत्तवपूर्ण पदाें की नियुक्तियाें मे भ्रष्टाचार और पक्षपात की आ रही शिकायताें से मैं चिन्तित हूं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का उक्त कथन हमारी शिक्षा प्रणाली की दयनीय स्थिति पर प्रकाश डालता है। अत: हमारे मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल को इन जमीनी हकीकताें को बदलना होगा तभी हमारा राष्ट्र पूर्ण रूप से साक्षर हो सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं हम अन्य शिक्षित व्यक्तियाें का कोई दायित्व नहीं बनता क्याेंकि लोकतंत्र में कोई भी विकास कार्य, योजना अथवा अभियान जनता की जागरूकता एवं सहभागिता के बिना संभव नहीं है। इसलिए साक्षरता संबंधी कार्यक्रमाें को भी और अधिक जन-सहभागिता आधारित किए जाने की आवश्यकता है। जब तक समाज में सीखने वाले और सिखाने वाले दोनाें नजदीक नहीं आएंगे तब तक साक्षरता संबंधित कोई भी कार्यक्रम सफल नहीं बन सकता।