राजनीति में सफल होने के दो रास्ते हैं। पहला रचनात्मक सामाजिक कार्यों के जरिए निर्वाचन क्षेत्र में अपनी व्यापक पकड़ बनाने का, दूसरा धर्म, जाति अथवा क्षेत्रीय आधार पर समाज को विभाजित कर अपना वोट बैंक बनाने का। पहला गांधीवादी रास्ता बेहद कष्ट साध्य है और इस तरह की राजनीति के सुफल बड़ी देर में प्राप्त होते हैं जबकि दूसरे रास्ते के जरिए आप रातोंरात सफल राजनेता बन जाते हैं। आजकल दूसरा रास्ता प्रचलन में है, वरुण गांधी के नाम के साथ भले ही गांधी जुड़ा है लेकिन उन्होंने गांधीवादी रास्ता अपनाने की गलती नहीं की। परिणाम सबके सामने है, आज हर तरफ वरुण गांधी छाए हुए हैं। वो इस वक्त भाजपा के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं। उमा भारती के भाजपा छोड़कर चले जाने के बाद नरेन्द्र मोदी की मांग सर्वाधिक रहती थी, आज चुनावी सेवाओं के लिए वरुण की मांग सर्वाधिक है। वरुण गांधी और भाजपा की रणनीति से तो हर कोई वाकिफ था लेकिन हमें गलत फहमी हो गई थी कि शायद चुनाव आयोग ने उनका खेल बिगाड़ दिया है। लेकिन भाजपा के रणनीतिकारों ने कानूनी रूप से भी बेहद सुदृढ़ रणनीति बनाई थी। वास्तविकता यह है कि सामाजिक विद्वेष पैदा करने वाला जहर बुझा भाषण देने के बावजूद चुनाव आयोग वरुण के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकता। उच्च न्यायालय में भी वरुण को जब राहत नहीं मिली तो उन्होंने पीलीभीत कोर्ट में सरेंडर कर जेल जाने का बेहद सफल राजनीतिक प्रयोग किया। हमारा कानून एक बार फिर राजनेताओं की इस नयी पौध के सामने पंगु नजर आया, इससे पूर्व राज ठाकरे की गिरफ्तारी के दौरान भी यही तमाशा हुआ। भाजपा की सफाई देखिये कि इस पूरे प्रहसन का पूरा राजनीतिक लाभ सुनिश्चित करने के साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि वो किसी तरह आदर्श आचार संहिता के झमेले में न फंस जाए। इसलिये हम कहते हैं कि क्या तो ऐसे कानूनों का फायदा क्या ऐसी आचार संहिता का औचित्य? इससे तो अच्छा यह है कि खुला खेल फरख्खावादी चलने दो, कमसे कम देश का समय और ऊर्जा तो बचे। जिन जटिल कानूनी प्रक्रियाओं से कुछ हासिल ही न हो उनसे क्या फायदा? बेहतर तो यह हो कि कानून के नाम पर अगर कुछ चले तो सिर्फ कुदरत का कानून चले। वरुण गांधी के उदय से एक फायदा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को भी हो गया है। उन्हें आक्रामक हिन्दुत्व की लहर पैदा करने के लिए अब आडवाणी खेमे के नरेन्द्र मोदी निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। अब अपनी यूपी के ही वरुण हैं ना ! अपनी राजनीति की यह विशेषता है कि वह किसी भी मुद्दे को अपने हित साधन का औजार बना लेती है। अब चूंकि क्रिकेट भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय खेल है तो इसका राजनीतिक प्रयोग न हो ऐसा कैसे हो सकता है। आईपीएल के पिछले संस्करण ने देशवासियों का भरपूर मनोरंजन किया था, इस बार भी सभी उसका बेताबी से इंतजार कर रहे थे, लेकिन आयोजकों ने मजा किरकिरा कर दिया। आईपीएल की तारीखें देश के एक और बेहद लोकप्रिय खेल चुनाव की तारीखों से टकरा गई। हम जैसे लोगों को जिनकी क्रिकेट और चुनाव में समान रूप से रुचि है निराश होना ही था। हम तो चाहते थे कि मनोरंजन के ये दोनों संस्करण अलग-अलग समय पर हों जिससे गप्प गोष्ठियों के लिए विषय का टोटा न रहे। लेकिन आईसीसी को झुका देने वाले बोर्ड को लगा कि वो सरकार को भी झुका देगा लेकिन वो यह भूल गया कि सरकार में बोर्ड से भी बड़े खिलाड़ी होते हैं, फलस्वरूप अब आईपीएल द. अफ्रीका में खेली जाएगी। अब इसको भी भाजपा ने मुद्दा बना लिया। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे राष्ट्रीय शर्म बताया तो गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने उन्होंने बता दिया कि राष्ट्रीय शर्म गुजरात दंगे थे। दरअसल पाकिस्तान में श्रीलंकाई खिलाड़ियों पर हमले के बाद सुरक्षा की चिंताएं बढ़ गई हैं। चुनावों में सुरक्षाबलों की अतिव्यस्तता के चलते राय असमर्थता जता रहे थे और आईपीएल के कार्यक्रम में संशोधन की बात कर रहे थे, लेकिन ललित मोदी इसके लिए तैयार नहीं थे। इस सब में सबसे रोचक यह है कि आईपीएल कराने में केन्द्र सरकार और कांग्रेस शासित राय सरकारों के असहयोग को दोष देने वाले नरेन्द्र मोदी की गुजरात पुलिस ने भी उन तारीखों में सुरक्षा व्यवस्था करने में असमर्थता जताई थी। है ना राजनीति क्रिकेट से भी कहीं यादा मजेदार ! जेड गुडी चल बसीं, ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे। उनकी भारत में एकमात्र पहचान यह थी कि उन्होंने बिग ब्रदर नाम रियलटी शो में शिल्पा शेट्टी पर नस्लभेदी टिप्पणी की थी। बहरहाल उन्होंने बाद में इसके लिए माफी मांग ली थी और उस टिप्पणी से शिल्पा को विजेता बनने का अवसर भी मिल गया। आज के इस दौर में किसी कलाकार की मौत भी किस तरह मीडिया के लिए हिट मसाला है, यह इस तथ्य से पता चलता है कि जेडगुडी की मौत के जीवंत प्रसारण के अधिकार भी महंगे दामों पर बिके। यानि ऐसे लोगों की भी आज दुनिया में कमी नहीं जिनके लिए दूसरे की मौत भी मनोरंजन का सामान है तो कुछ इस बात से अनजान भी होंगे कि आदमी कैसे मरता है। यदि आदि काल में मीडिया का इतना विस्तार होता तो सिध्दार्थ को गौतम बुध्द न बनना पड़ता। जिला कलेक्टर पीसी किशन के जिले के दूरदराज गांवों में रात्रि विश्राम जारी हैं। कई गांव तो ऐसे हैं जिन्होंने किसी कलेक्टर को पहली बार देखा है। इसमें संदेह नहीं कि सरकारी सुविधाओं की सर्वाधिक आवश्यकता गांवों में है। भारी भरकम सरकारी योजनाओं का लाभ गांव वालों को मिल रहा है या नहीं यह सुनिश्चित करना प्रशासनिक अधिकारियों का काम है, लेकिन गांवों में कोई जाना नहीं चाहता। फलस्वरूप सरकारों को विभिन्न अभियानों के नाम से अधिकारियों को गांवों में जाने के लिए कहना पड़ता है। लेकिन हमारे अधिकारी इन समस्त अभियानों को खानापूर्ति बना देते हैं, कभी किसी की रुकना पड़ा तो उसने रात्रि विश्राम को पिकनिक बना लिया। इसलिये इन अभियानों से हमें विशेष उम्मीद नहीं रहती लेकिन कलेक्टर साहब अपवाद साबित हुए हैं। वो जिस एकाग्रता और समर्पण से ग्रामीणों तक पहुंचकर उनकी सुन रहे हैं, उसने हमें उनका प्रशंसक बना दिया है। ध्यान रखने की बात सिर्फ इतनी सी है कि कलेक्टर साहब यह सुनिश्चित करें कि उनके निर्देशों पर अमल भी हो। वरना ये प्रयास निरर्थक जाएंगे और ग्रामीणों का तंत्र से भरोसा सदा क ेलिए उठ जायेगा। पिछले दिनों ऋण मेला के लिए ग्रामीण औरतों को बुला तो लिया गया लेकिन उनकी सुध न अधिकारियों ने ली न बैंकों ने। इस तरह की लापरवाही के दोषियों को बख्शा नहीं जाना चाहिए।
गुरुवार, 2 अप्रैल 2009
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