सोमवार, 10 अगस्त 2009

Dont Kiss While Driving




Today, I found an interesting article ‘Dont Kiss While Driving’ written by Alan Cohen (author of Why Your Life Sucks and What You Can Do About It) in my father’s scrapbook. And I decided to share it with all of you. This article gives a message that anything worth doing, is worth doing with a whole heart. Lets enjoy this article.

‘ I saw a romantic greeting card which showed a couple kissing in the front seat of a car. The message said, ‘ If you can kiss while driving safely, you are not giving the kiss the attention it deserves.’ Any thing that is worth doing, is worth doing with a whole heart, mind and body.

We get into the trouble not because we do things that are wrong, but because we approach our activities with divided intentions. Our body is doing one thing while our heart is elsewhere. We go to jobs wet rather not be at, we sleep with people we dont love, we go to parties we secretly find boring or repulsive. At the same time we love people we dont express our love for, we deny ourselves food we would really enjoy, we know truths we do not act on.

I have a very simple definition of integrity: You are in integrity when what you are doing on the outside matches who you are on the inside. I respect people who do things I don’t agree with, or wouldn’t do myself, but I respect them for being 100 percent who they are. They are in integrity.

In Emmanuel’s Book II : The Choice For Love, Emmanuel suggests, ” When you move into your physical loving, as you remove your clothing, take off your mind as well. It simply in not equipped to hear the music.” In the movie City Slickers, a veteran cowboy named Curly teaches some angst-ridden dudes some country wisdom. When things get tough, Curly raises his index finger and nods. Eventually the city slickers figure out what he meant: ” Do one thing at a time. If you can really focus on what is right before you, every thing falls into place.”

I noticed that when I did book signings, I felt rushed so I could accommodate everyone in line. I was not fully present with some people because I was aware of the people because I was aware of the people behind them in line. Then I realised that I was cheating them and myself. So I decided to be fully present with each person, and stay with them until I really connected with them. Suddenly book signings became a delight. Now I love talking to people, touching them, looking into their eyes. I learned that it does not take a lot of time to make contact; just a few moments of full presence can be completely fulfilling.

Everything is like kissing and driving. If you’re driving, really drive. If you’re kissing really kiss.’

मंगलवार, 14 जुलाई 2009

बाल श्रम एक सामाजिक समस्या

आज हमारा देश विभिन्न सामाजिक समस्याओं से जूझ रहा है जिसमें बाल श्रम एक प्रमुख एवं संवेदनशील समस्या है। वर्तमान में बाल श्रम की समस्या देश के विकास में रोड़ा बन रही है। भारतीय संविधान में हमेशा से ही बाल श्रम समाप्त करने तथा बच्चों के सम्पूर्ण विकास के लिये आवश्यक उपाय किए जाते रहे हैं लेकिन वे सब अपर्याप्त ही रहे। आज बाल श्रम कानून को बने हुए 23 साल हो जाने के बावजूद हमारे देश में सर्वाधिक बाल मजदूर हैं। भारतीय सरकार के अनुसार देश में लगभग 12 लाख 60 हजार बाल मजदूर हैं। परंतु एक निजी संस्था के सर्वेक्षण के अनुसार अकेली दिल्ली में ही 70 लाख के करीब बाल मजदूर हैं।
एक अनुमान के अनुसार देश में प्रतिवर्ष 420000 बच्चे आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात रायों में बाल श्रमिक के तौर पर कार्य करने के लिये मजबूर होते हैं। देश में सबसे दयनीय स्थिति तो बालिका मजदूरों की है क्योंकि लड़कियों को कर्मचारियों के रूप में न देखकर केवल सहायक के रूप में देखा जाता है जिसके कारण बाल श्रम कानून भी इनकी रक्षा नहीं कर पाता। बाल श्रम का सबसे वीभत्स रूप वैश्यावृति और बंधुआ मजदूरी है। आईएलओ के अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 350000 बाल वैश्याएं हैं।
बाल श्रम का मूल कारण गरीबी है। गरीबी के अलावा प्रभावी शिक्षा व्यवस्था का अभाव, मां बाप की संकीर्ण मानसिकता एवं जागरूकता की कमी भी बाल श्रम को बढ़ावा देते हैं। मां बाप अपने बच्चे को औपचारिक शिक्षा दिलाने के बजाए कम उम्र में कार्य कौशल सिखाना यादा लाभप्रद समझते हैं। जिससे वो अपने परिवार की मदद कर सके। देश में सामाजिक कल्याण व्यवस्था का अभाव और आय के वैकल्पिक स्त्रोतों की कमी के कारण भी मां बाप अपने बच्चे से मजदूरी करवाने के लिये मजबूर हैं।
वर्तमान में सरकार और विभिन्न गैर सरकारी संस्थाएं बाल श्रम को समाप्त करने का प्रयास कर रही हैं। परंतु जहन में एक सवाल यह उठता है कि यदि बाल श्रम पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया जाए तो इन गरीब बच्चों के परिवारों का क्या होगा, क्या बच्चों की अतिरिक्त आय के बिना इनके परिवार जीवित रह पायेंगे? आईएलओ ने एक अध्ययन में पाया के परिवार की कुल आमदनी में बच्चों की आमदनी का हिस्सा 34 से 37 प्रतिशत के मध्य होता है। आईएलओ सांख्यिकी ब्यूरो के मुताबिक बच्चे का मजदूरी अथवा घरेलू उद्यमों के रूप में काम करना परिवार का आर्थिक स्तर को बनाए रखने के लिये आवश्यक है।
अत: सरकार को बाल श्रम समाप्त करने से पहले गरीबों की जरुरतों को पूरा करना पड़ेगा क्योंकि कोई भी सरकार बिना गरीबी को समाप्त करे बाल श्रम को पूर्ण रूप से समाप्त नहीं कर सकती।

रविवार, 12 जुलाई 2009

Success Has Hundred Husbands

Actually this post was to be published on July 7, 09 but I couldn’t.

‘ Today, my PET’s result has declared. It was very far from my expectations. Result was good but not my best. Actually everytime everything cann’t be perfect. I knew my bad time has started. I was overburdned by expectations of my relatives and well-wishers except my parents. My parents never pressurize me for anything. They know my ability of doing work. I was preparing myself for bearing ‘emotional-atayachar’. Your well-wishers are just like Indian Media. When you win match they appreciate you, give respect and make you feel that you are the king of this world but when you lose, you lose everything. Everybody forgets your previous achievements. My father aksar (usually) says that success has hundred husbands but failure has none. He has changed the original one. I am totally agry with these lines. When I got good marks in Class X, everyone was standing behind me . Everyone was appreciating me. I was at the top of the world. But….As I slipped little from my bench mark, no one was there even for consolation. Today I am alone. I have no freinds, no relatives and no well-wishers. This one result has changed everything. But this result can never change my parents. They are my real freinds, my real supporters and real well-wishers. They are everything for me.And I am not going to be depress because I have self confidence that one day success will again return.’

Note: I am very innocent with English. So please forgive my mistakes.

http://www.blogcatalog.com/directory/academics

रविवार, 5 जुलाई 2009

राष्ट्र की शिक्षा चिंता का विषय


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किसी भी राष्ट्र की सामाजिक एवं सांस्कृतिक उन्नति वहां की शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करती है। एक विकसित राष्ट्र जितना ध्यान अपने यहां कारखाने खोलने, बांध और सड़कें बनाने पर देता है उससे कहीं अधिक ध्यान वह अपने नागरिक ों को शिक्षित करने पर देता है। अत: साक्षरता व्यक्ति और देश की उन्नति की महत्तवपूर्ण शर्त है। अच्छी शिक्षा से ज्ञान की वृध्दि होती है, नम्रता आती है, भले बुरे का भेद जानने की क्षमता विकसित होती है और इससे वह समाज का योग्य व्यक्ति बन जाता है। इसलिए विद्या को मनुष्य का स्थायी आभूषण कहा गया है। भारत का प्राचीन इतिहास ज्ञान एवं शिक्षा के विकास की दृष्टि से बहुत अग्रणी रहा है किन्तु पिछले 200 वर्षों में ज्ञान और शिक्षा की दृष्टियों से निरन्तर गिरावट आई है। यदि हम 2001 की जनगणना के आंकडाें पर नजर डालें तो हमारे देश में 64.84 प्रतिशत व्यक्ति ही साक्षर हैं और 30 करोड़ व्यक्ति अभी भी हमारे देश में ऐसे हैं जो शिक्षा से वंचित हैं। भले ही आज विद्यालयाें एवं महाविद्यालयाें की संख्या पहले से अधिक है परन्तु उनमें पढाई के साधनाें की कमी है। सबसे बुरी हालत तो प्राथमिक शालाआें की है, क्याेंकि वो मूलभूत सुविधाआें एवं प्रशिक्षित अध्यापकाें के लिए तरस रहे हैं। पिछले दिनाें हुए एक सर्वेक्षण पर नार डालें तो भारत में एक लाख विद्यालय ऐसे हैं जो सिर्फ एक कमरे में ही चल रहे हैं तथा अन्य 75000 विद्यालय ऐसे हैं जिन्हें एक कमरा तक नसीब नहीं है । देश के 15 प्रतिशत स्कूलाें में एक से अधिक शिक्षक नहीं है। देश में अनुपस्थित रहने वाले शिक्षकों की संख्या 15 से 42 प्रतिशत के बीच है। पिछले सालाें में हुए आकस्मिक निरीक्षणाें के दौरान आधे से भी कम शिक्षक पढाते मिले। निश्चित तौर पर यह सरकार के लिए चिंता की बात है क्योंकि इन्हीं कारणाें की वजह से अन्तराष्ट्रीय स्तर पर चीन और थाईलैंड जैसे विकासशील देशाें से शिक्षा के क्षेत्र में हम अभी भी पीछे हैं। आज हमारे देश में बालक बालिकाआें को जो शिक्षा दी जाती है, उसमें रटने की परम्परा को अधिक बढावा मिल रहा है, इससे विद्यार्थियाें का उचित विकास नहीं हो पा रहा है। उनमें रोजगार-प्रधान शिक्षा का अभाव है। एक अनुमान के अनुसार देश में हर 5 में से केवल 1 व्यक्ति ने व्यावसायिक प्रशिक्षण लिया हुआ होता है जबकि चीन एवं थाईलैंड जैसे अन्य विकासशील देशाें में यह दर 5 मेें से 4 की है। इसी कारण से हमारे देश के नवयुवकाें को पढ़ाई पूरी करने के बाद भी राोगार के लिए भटकना पड़ता है। वर्तमान समय में सरकार द्वारा शिक्षा को सभी स्तराें पर प्रोत्साहित करने के लिए सर्व शिक्षा अभियान, मिड डे मील, डी पी ई पी जैसी अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं। इन योजनाआें का मुख्य उद्देश्य देश में लगभग 1.1 मिलियन बच्चाें को अच्छी शिक्षा प्रदान कराना तथा विद्यालयाें में मूलभूत सुविधाआें के अभाव को दूर करना है, परन्तु हमारे देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण यह योजनाएं आशा के अनुरूप परिणाम नहीं दे पाईं। हमारी विश्वविद्यालय प्रणाली, कई भागाें में जीर्णता की स्थिति में है। देश में लगभग आधे जिलाें में उच्च शिक्षा की स्थिति दयनीय है। हमारे देश के लगभग दो तिहाई विश्वविद्यालय और 90 प्रतिशत कॉलेज गुणवत्ता के मानकाें पर खरे नहीं उतरते। कई रायाें में विश्वविद्यालय के उपाध्यक्ष, वाईस चांसलर्स जैसे महत्तवपूर्ण पदाें की नियुक्तियाें मे भ्रष्टाचार और पक्षपात की आ रही शिकायताें से मैं चिन्तित हूं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का उक्त कथन हमारी शिक्षा प्रणाली की दयनीय स्थिति पर प्रकाश डालता है। अत: हमारे मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल को इन जमीनी हकीकताें को बदलना होगा तभी हमारा राष्ट्र पूर्ण रूप से साक्षर हो सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं हम अन्य शिक्षित व्यक्तियाें का कोई दायित्व नहीं बनता क्याेंकि लोकतंत्र में कोई भी विकास कार्य, योजना अथवा अभियान जनता की जागरूकता एवं सहभागिता के बिना संभव नहीं है। इसलिए साक्षरता संबंधी कार्यक्रमाें को भी और अधिक जन-सहभागिता आधारित किए जाने की आवश्यकता है। जब तक समाज में सीखने वाले और सिखाने वाले दोनाें नजदीक नहीं आएंगे तब तक साक्षरता संबंधित कोई भी कार्यक्रम सफल नहीं बन सकता।

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

How far do you go to ensure your child performs well?

When Akash scored 68% in his class X examinations, his father, a public sector employee, went into depression. When he came out of it, he decided to make his son repeat the class. The boy was kept in solitary confinement at home and made to study 17 hours a day. By the time he reappeared for the exam he had already cleared, Akash was a nervous wreck. This time round, he scored 49%. His father beat him black and blue.
The boy lost his sleep and appetite, remained scared and anxious, and showed symptoms of social withdrawl. Finaly, his father took him to the stress management clinic.“ The first ten sessions that we had with the family were dedicated to dealing with the internal insecurities of the father. It turned out that the father’s own sense of under achievement was being directed at the son” says Doctor.
A study conducted by an NGO working with schools in Delhi,proved that cases such as Akash’s are by no means an exception. The study, which psychologically profiled 1200 students from 100 schools found that nearly 60 percent of the students who showed signs of pressure had parents suffering from a sense of underachievement.
“ Even the most lovig parents often do not realise that they are using their child to fulfill their own aspirations and treating him or her as a mere extension of their own selves,” says Dr. Rajesh.
The parents’ argument is that they only want their child to grow up into a well – rounded individual, who has not missed out anything during his growing up years like they did. But just stop and think for a moment -
Do you really want your child to grow up as an anxious young person? Or would you rather allow him the time to enjoy his childhood and shape up as a balanced, relaxed and well – adjusted individual?

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

Will you allow your child to fall in love?


Mrs. Verma says it came as a shock when she inadvertently found that her 13 year old daughter had a boyfriend. “ I read his email to her by mistake” says Mrs. Verma. “ I didn’t know what to do. I wanted to shout at her and even lock her up in her room,” she says.

Today, Mrs. Verma is thankful she did none of those things. Instead, she decided to delicately broach the subject and pray that her daughter would take her into confidence. She did. “ The ice broken, i was able to advise her on the relationship,” says Verma.

“ We have to accept it. Children are getting into romantic relationships at a young age,” she says. “ Parents who communicate with their children openly will know when this happens. The best thing to do then is to tell them the right and wrong of the relationships. Give them the right inputs and pray that they will make the right choices. Do not make them feel like criminals or they will retaliate and not tell you anything in future. They might even start viewing you as a stranger with unreasonable expectations,” she adds.

Dr. Bhagat’s advise is: “Help the children take decisions regarding their life, but do not dictate their decisions. Find a way of talking about difficult issues like sex and drugs. Try not to panic when the child explores his or her sexuality through relationships. And most important, respect the child’s privacy and dignity.”

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

चले बस कुदरत का कानून!

राजनीति में सफल होने के दो रास्ते हैं। पहला रचनात्मक सामाजिक कार्यों के जरिए निर्वाचन क्षेत्र में अपनी व्यापक पकड़ बनाने का, दूसरा धर्म, जाति अथवा क्षेत्रीय आधार पर समाज को विभाजित कर अपना वोट बैंक बनाने का। पहला गांधीवादी रास्ता बेहद कष्ट साध्य है और इस तरह की राजनीति के सुफल बड़ी देर में प्राप्त होते हैं जबकि दूसरे रास्ते के जरिए आप रातोंरात सफल राजनेता बन जाते हैं। आजकल दूसरा रास्ता प्रचलन में है, वरुण गांधी के नाम के साथ भले ही गांधी जुड़ा है लेकिन उन्होंने गांधीवादी रास्ता अपनाने की गलती नहीं की। परिणाम सबके सामने है, आज हर तरफ वरुण गांधी छाए हुए हैं। वो इस वक्त भाजपा के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं। उमा भारती के भाजपा छोड़कर चले जाने के बाद नरेन्द्र मोदी की मांग सर्वाधिक रहती थी, आज चुनावी सेवाओं के लिए वरुण की मांग सर्वाधिक है। वरुण गांधी और भाजपा की रणनीति से तो हर कोई वाकिफ था लेकिन हमें गलत फहमी हो गई थी कि शायद चुनाव आयोग ने उनका खेल बिगाड़ दिया है। लेकिन भाजपा के रणनीतिकारों ने कानूनी रूप से भी बेहद सुदृढ़ रणनीति बनाई थी। वास्तविकता यह है कि सामाजिक विद्वेष पैदा करने वाला जहर बुझा भाषण देने के बावजूद चुनाव आयोग वरुण के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकता। उच्च न्यायालय में भी वरुण को जब राहत नहीं मिली तो उन्होंने पीलीभीत कोर्ट में सरेंडर कर जेल जाने का बेहद सफल राजनीतिक प्रयोग किया। हमारा कानून एक बार फिर राजनेताओं की इस नयी पौध के सामने पंगु नजर आया, इससे पूर्व राज ठाकरे की गिरफ्तारी के दौरान भी यही तमाशा हुआ। भाजपा की सफाई देखिये कि इस पूरे प्रहसन का पूरा राजनीतिक लाभ सुनिश्चित करने के साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि वो किसी तरह आदर्श आचार संहिता के झमेले में न फंस जाए। इसलिये हम कहते हैं कि क्या तो ऐसे कानूनों का फायदा क्या ऐसी आचार संहिता का औचित्य? इससे तो अच्छा यह है कि खुला खेल फरख्खावादी चलने दो, कमसे कम देश का समय और ऊर्जा तो बचे। जिन जटिल कानूनी प्रक्रियाओं से कुछ हासिल ही न हो उनसे क्या फायदा? बेहतर तो यह हो कि कानून के नाम पर अगर कुछ चले तो सिर्फ कुदरत का कानून चले। वरुण गांधी के उदय से एक फायदा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को भी हो गया है। उन्हें आक्रामक हिन्दुत्व की लहर पैदा करने के लिए अब आडवाणी खेमे के नरेन्द्र मोदी निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। अब अपनी यूपी के ही वरुण हैं ना ! अपनी राजनीति की यह विशेषता है कि वह किसी भी मुद्दे को अपने हित साधन का औजार बना लेती है। अब चूंकि क्रिकेट भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय खेल है तो इसका राजनीतिक प्रयोग न हो ऐसा कैसे हो सकता है। आईपीएल के पिछले संस्करण ने देशवासियों का भरपूर मनोरंजन किया था, इस बार भी सभी उसका बेताबी से इंतजार कर रहे थे, लेकिन आयोजकों ने मजा किरकिरा कर दिया। आईपीएल की तारीखें देश के एक और बेहद लोकप्रिय खेल चुनाव की तारीखों से टकरा गई। हम जैसे लोगों को जिनकी क्रिकेट और चुनाव में समान रूप से रुचि है निराश होना ही था। हम तो चाहते थे कि मनोरंजन के ये दोनों संस्करण अलग-अलग समय पर हों जिससे गप्प गोष्ठियों के लिए विषय का टोटा न रहे। लेकिन आईसीसी को झुका देने वाले बोर्ड को लगा कि वो सरकार को भी झुका देगा लेकिन वो यह भूल गया कि सरकार में बोर्ड से भी बड़े खिलाड़ी होते हैं, फलस्वरूप अब आईपीएल द. अफ्रीका में खेली जाएगी। अब इसको भी भाजपा ने मुद्दा बना लिया। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे राष्ट्रीय शर्म बताया तो गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने उन्होंने बता दिया कि राष्ट्रीय शर्म गुजरात दंगे थे। दरअसल पाकिस्तान में श्रीलंकाई खिलाड़ियों पर हमले के बाद सुरक्षा की चिंताएं बढ़ गई हैं। चुनावों में सुरक्षाबलों की अतिव्यस्तता के चलते राय असमर्थता जता रहे थे और आईपीएल के कार्यक्रम में संशोधन की बात कर रहे थे, लेकिन ललित मोदी इसके लिए तैयार नहीं थे। इस सब में सबसे रोचक यह है कि आईपीएल कराने में केन्द्र सरकार और कांग्रेस शासित राय सरकारों के असहयोग को दोष देने वाले नरेन्द्र मोदी की गुजरात पुलिस ने भी उन तारीखों में सुरक्षा व्यवस्था करने में असमर्थता जताई थी। है ना राजनीति क्रिकेट से भी कहीं यादा मजेदार ! जेड गुडी चल बसीं, ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे। उनकी भारत में एकमात्र पहचान यह थी कि उन्होंने बिग ब्रदर नाम रियलटी शो में शिल्पा शेट्टी पर नस्लभेदी टिप्पणी की थी। बहरहाल उन्होंने बाद में इसके लिए माफी मांग ली थी और उस टिप्पणी से शिल्पा को विजेता बनने का अवसर भी मिल गया। आज के इस दौर में किसी कलाकार की मौत भी किस तरह मीडिया के लिए हिट मसाला है, यह इस तथ्य से पता चलता है कि जेडगुडी की मौत के जीवंत प्रसारण के अधिकार भी महंगे दामों पर बिके। यानि ऐसे लोगों की भी आज दुनिया में कमी नहीं जिनके लिए दूसरे की मौत भी मनोरंजन का सामान है तो कुछ इस बात से अनजान भी होंगे कि आदमी कैसे मरता है। यदि आदि काल में मीडिया का इतना विस्तार होता तो सिध्दार्थ को गौतम बुध्द न बनना पड़ता। जिला कलेक्टर पीसी किशन के जिले के दूरदराज गांवों में रात्रि विश्राम जारी हैं। कई गांव तो ऐसे हैं जिन्होंने किसी कलेक्टर को पहली बार देखा है। इसमें संदेह नहीं कि सरकारी सुविधाओं की सर्वाधिक आवश्यकता गांवों में है। भारी भरकम सरकारी योजनाओं का लाभ गांव वालों को मिल रहा है या नहीं यह सुनिश्चित करना प्रशासनिक अधिकारियों का काम है, लेकिन गांवों में कोई जाना नहीं चाहता। फलस्वरूप सरकारों को विभिन्न अभियानों के नाम से अधिकारियों को गांवों में जाने के लिए कहना पड़ता है। लेकिन हमारे अधिकारी इन समस्त अभियानों को खानापूर्ति बना देते हैं, कभी किसी की रुकना पड़ा तो उसने रात्रि विश्राम को पिकनिक बना लिया। इसलिये इन अभियानों से हमें विशेष उम्मीद नहीं रहती लेकिन कलेक्टर साहब अपवाद साबित हुए हैं। वो जिस एकाग्रता और समर्पण से ग्रामीणों तक पहुंचकर उनकी सुन रहे हैं, उसने हमें उनका प्रशंसक बना दिया है। ध्यान रखने की बात सिर्फ इतनी सी है कि कलेक्टर साहब यह सुनिश्चित करें कि उनके निर्देशों पर अमल भी हो। वरना ये प्रयास निरर्थक जाएंगे और ग्रामीणों का तंत्र से भरोसा सदा क ेलिए उठ जायेगा। पिछले दिनों ऋण मेला के लिए ग्रामीण औरतों को बुला तो लिया गया लेकिन उनकी सुध न अधिकारियों ने ली न बैंकों ने। इस तरह की लापरवाही के दोषियों को बख्शा नहीं जाना चाहिए।